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उत्तराखंड के पहाड़ों में एक बार फिर जंगलों से लेकर गांवों तक एक मधुर और रहस्यमयी आवाज गूंज रही है “काफल पाको, मै नि चाख्यो…”।

इन दिनों उत्तराखंड के पहाड़ों में एक बार फिर जंगलों से लेकर गांवों तक एक मधुर और रहस्यमयी आवाज गूंज रही है “काफल पाको, मै नि चाख्यो…”। जैसे ही पहाड़ों में लाल-भूरे जंगली फल काफल पकने लगते हैं, वैसे ही घने जंगलों और ऊंचे पेड़ों की पत्तियों के बीच छिपी एक छोटी-सी चिड़िया अपनी सुरीली तान से पूरे वातावरण को जीवंत कर देती है। पहाड़ के लोग इसे “काफल-पाको चिड़िया” के नाम से जानते हैं, जबकि वैज्ञानिक दुनिया में इसे इंडियन कुक्कू कहा जाता है, जिसका वैज्ञानिक नाम कुकुलस माइक्रोप्टेरस (Cuculus Micropterus) है।

यह चिड़िया बहुत कम दिखाई देती है, लेकिन इसकी मधुर आवाज दूर-दूर तक सुनाई देती है। चार भागों में बंटी सीटी जैसी इसकी सुरीली तान दोपहर बाद से लेकर देर शाम तक पहाड़ों के जंगलों में गूंजती रहती है। गांवों के बुजुर्ग मानते हैं कि यह चिड़िया लोगों को यह संदेश देने आती है कि जंगलों में काफल पक चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह पक्षी ठीक उसी समय पहाड़ों में सुनाई देता है, जब काफल पकने लगते हैं, और जैसे ही काफल का मौसम समाप्त होता है, यह रहस्यमयी चिड़िया भी मानो कहीं गायब हो जाती है।

स्थानीय लोगों के अनुसार यह चिड़िया सलेटी-भूरे रंग की होती है और आकार में कबूतर जितनी या उससे कुछ छोटी दिखाई देती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हमेशा पेड़ों की घनी पत्तियों और झुरमुटों में छिपकर गाती है, जिससे इसे कैमरे में कैद करना बेहद कठिन माना जाता है। कई लोग वर्षों तक इसकी आवाज सुनते रहते हैं, लेकिन इसे करीब से देख नहीं पाते।

विशेषज्ञों के अनुसार इंडियन कुक्कू गर्मियों और मानसून के दौरान मध्य भारत से लेकर उत्तरी भारत के हिमालयी क्षेत्रों तक प्रवास करती है। कीड़े-मकोड़े इसका मुख्य भोजन हैं। वैज्ञानिक अब भी यह पूरी तरह पता नहीं लगा पाए हैं कि मानसून समाप्त होने के बाद यह चिड़िया आखिर कहां चली जाती है। यही रहस्य इसे और अधिक रोचक बनाता है।

पहाड़ की लोकसंस्कृति में “काफल-पाको” चिड़िया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि एक मार्मिक लोककथा का जीवंत प्रतीक भी है। लोककथा के अनुसार एक गरीब महिला जंगल से काफल तोड़कर बाजार में बेचती थी। एक दिन उसने अपनी छोटी बेटी को काफलों की रखवाली करने को कहा और जंगल चली गई। शाम को लौटने पर टोकरी में काफल कम दिखाई दिए। उसे लगा कि बेटी ने काफल खा लिए हैं। गुस्से में उसने बेटी को मार दिया, लेकिन बाद में शाम की ठंडी हवा लगने से काफल फिर से फूलकर पहले जैसे भर गए। तब मां को अपनी भूल का एहसास हुआ और पश्चाताप में उसने भी अपनी जान दे दी। कहा जाता है कि वही बेटी आज चिड़िया बनकर कहती है — “काफल पाक्यो, मै नि चाख्यो…” और मां दूसरी आवाज में उत्तर देती है — “पूर पूर…” यानी “पूरे हैं बेटी, पूरे हैं।”

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इस समय काफल के जंगल फलों से लदे हुए हैं। समुद्र तल से लगभग 1500 से 2500 मीटर की ऊंचाई पर उगने वाला काफल केवल स्वादिष्ट फल ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। काफल, बांज, बुरांश और भमोर के मिश्रित जंगल प्राकृतिक जल स्रोतों को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। पहाड़ों के अनेक गांवों में पेयजल के प्राकृतिक स्रोत इन्हीं जंगलों की जड़ों से निकलते हैं।

आयुर्वेदिक दृष्टि से भी काफल बेहद उपयोगी माना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम माईरिका एस्क्यूलेटा (Myrica esculenta) है। इसके फल शरीर को गर्मियों में ठंडक पहुंचाते हैं तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक माने जाते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि इसका सेवन हृदय रोग, मधुमेह तथा रक्तचाप नियंत्रण में भी लाभकारी होता है। काफल के पेड़ की छाल का उपयोग चर्मशोधन यानी टैनिंग में भी किया जाता है।

गंगा विचार मंच, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG), जलशक्ति मंत्रालय भारत सरकार के प्रदेश संयोजक लोकेन्द्र सिंह बिष्ट का कहना है कि काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, लोककथाओं, पर्यावरण और जल स्रोतों से जुड़ी अमूल्य धरोहर है। उनका कहना है कि पहाड़ों में गूंजती “काफल पाको” की आवाज केवल एक पक्षी की धुन नहीं, बल्कि प्रकृति और लोकजीवन के बीच सदियों पुराने रिश्ते की पहचान है।

Santosh Singhhttps://www.samacharlive.in
Santosh Singh is an author and news content contributor at Samachar Live, an independent Hindi news and information website. He is involved in researching, preparing, editing and publishing news content across various categories. Contact Samachar Live team at samacharlive.in@gmail.com
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