लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि बच्चे न होने को लेकर झगड़े और एक-दूसरे को अपशब्द कहने के दौरान पति का अपनी पत्नी को “बांझ” कहना IPC की धारा 498-A के तहत क्रूरता नहीं माना जाएगा।
जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला ने 13 अगस्त को पति की याचिका पर यह आदेश दिया। पति ने लखनऊ कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे क्रूरता, दहेज की मांग और जान-बूझकर अपमान करने की शिकायत पर तलब किया गया था।
उसके खिलाफ IPC की धारा 498-A (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता), 323 (जान-बूझकर चोट पहुंचाना), 504 (जान-बूझकर अपमान करना) और 506 (आपराधिक धमकी) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 (दहेज देना या लेना और दहेज की मांग करना) के तहत आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई।
यह मामला एक ऐसी शादी से जुड़ा था जिसमें जोड़े को कोई बच्चा नहीं हो पाया था। झगड़े के दौरान, पति और उसके रिश्तेदारों ने कथित तौर पर महिला को “बांझ” कहा, जबकि महिला ने बदले में अपने पति को “नपुंसक” कहा।
हाई कोर्ट ने कहा कि इन कथित टिप्पणियों को वैवाहिक कलह और दोनों पक्षों के बीच अपशब्दों के आदान-प्रदान के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने माना कि पति का अपनी पत्नी को “बांझ” कहना, भले ही “संवेदनहीन और निंदनीय” हो, लेकिन इस मामले की परिस्थितियों में अकेले IPC की धारा 498-A के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा, “बच्चे न होने को लेकर ताने मारना, मेडिकल जांच कराने से इनकार करना, या ऐसी घरेलू कलह से उपजी मौखिक बहस, अगर IPC की धारा 498-A के तहत क्रूरता की ज़रूरी शर्तें पूरी नहीं करती हैं, तो वे अपने आप में क्रूरता का अपराध नहीं बनाती हैं।
बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि बच्चे न होना शादी में निराशा का कारण बन गया था, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों की ओर से आरोप-प्रत्यारोप और अपशब्दों का इस्तेमाल हुआ।
कोर्ट ने पाया कि अगर अभियोजन पक्ष की कहानी को पूरी तरह से पढ़ा जाए और उस पर कोई सवाल न उठाया जाए, तो भी वह “बहुत ही असंभव” लगती है, और इसलिए पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि मूल शिकायत में दहेज की मांग का कोई आरोप नहीं था, जबकि शिकायतकर्ता के बयान में बाद में ऐसा आरोप सामने आया। इसमें कहा गया कि बाद वाले बयान का इस्तेमाल मूल शिकायत की कमियों को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता।


