Iran-Israel War: ईरान और इजरायल के बीच चल रहे सैन्य संघर्ष ने वैश्विक व्यापार को बुकी तरह प्रभावित किया है। और इसका सीधा असर भारत के बासमती चावल निर्यात पर पड़ा है। विशेष रूप से हरियाणा के करनाल, कैथल और अन्य जिलों में बासमती चावल के निर्यातकों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। युद्ध के कारण कांडला और मुंद्रा बंदरगाहों पर करीब 1.5 से 2.5 लाख टन बासमती चावल के शिपमेंट अटक गए हैं। जिससे निर्यातकों को करोड़ों रुपये के नुकसान की आशंका सता रही है।
ऑल इंडिया राइस एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल के अनुसार ईरान भारत से बासमती चावल का सबसे बड़ा खरीदार है। जहां हर साल करीब 1 मिलियन टन चावल निर्यात होता है। लेकिन युद्ध के चलते बीमा कंपनियां जोखिम के कारण कवर देने से कतरा रही हैं। जिसके परिणामस्वरूप शिपमेंट रुक गए हैं। राइस मिलर एसोसिएशन के प्रधान अमरजीत छाबड़ा ने बताया कि गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पर फंसा माल न तो ईरान भेजा जा सकता है और न ही वापस लाया जा सकता है। जिससे चावल खराब होने का खतरा बढ़ गया है।
कीमतों में गिरावट और किसानों पर असर
युद्ध के कारण बासमती चावल की कीमतों में 10-12% की गिरावट दर्ज की गई है। एक महीने पहले तक 950-1000 डॉलर प्रति टन की दर से निर्यात होने वाला बासमती चावल अब 900-950 डॉलर प्रति टन पर आ गया है। दिल्ली के निर्यातक नरेंद्र मिगलानी ने कहा कि ईरान को भेजे गए चावल के भुगतान में देरी और शिपमेंट रुकने से व्यापारियों का करीब 3200 करोड़ रुपये का भुगतान अटक गया है। इसका असर केवल निर्यातकों तक सीमित नहीं है। राइस मिलरों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई। तो धान की खरीद पर भी असर पड़ सकता है। जिससे हरियाणा और पंजाब के किसानों को नुकसान होगा। हाड़ौती अंचल में धान और चावल के दामों में प्रति क्विंटल 500-1000 रुपये की कमी देखी गई है। जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।
वहीं कुछ निर्यातकों को उम्मीद है कि खाद्य सुरक्षा के कारण बासमती चावल का व्यापार जल्द सामान्य हो सकता है। सतीश गोयल ने कहा “युद्ध की स्थिति में भी खाद्य सामग्री का व्यापार जारी रहता है। हमें उम्मीद है कि शिपमेंट जल्द शुरू होंगे।”






