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लॉ की डिग्री नहीं…फिर भी बने भारत के मुख्य न्यायाधीश, जानें कौन हैं देश के 10वें CJI कैलाश नाथ वांचू


Kailas Nath Wanchoo: सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस सूर्यकांत ने सोमवार को भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस बीच एक अनोखा नाम भी सामने आया है। नाम है कैलास नाथ वांचू, जिन्होंने भारत के 10वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रुप में शपथ ली। लेकिन उनकी खासियत यह है कि उन्होंने कभी औपचारिक रूप से कानून की डिग्री नहीं ली और न ही वे वकील के रूप में प्रैक्टिस किए। फिर भी, वे सर्वोच्च न्यायालय के शीर्ष पद तक पहुंचे। अब सोटने वाली बात यह है कि आखिर ये कैसे हो सकता है? आइए, उनके जीवन, करियर और उस दौर की परिस्थितियों पर नजर डालते है।


कैलास नाथ वांचू का प्रारंभिक जीवन


बता दें, कैलास नाथ वांचू का जन्म 25फरवरी 1903को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा मध्य प्रदेश के नौगोंग में हुई, जबकि माध्यमिक शिक्षा कानपुर के पंडित पृथ्वी नाथ हाई स्कूल में। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद के म्यूर सेंट्रल कॉलेज से बी.ए. की डिग्री हासिल की और फिर ऑक्सफोर्ड के वडहम कॉलेज में पढ़ाई की। जानकारी के अनुसार, उनकी शिक्षा विज्ञान और गणित जैसे विषयों पर केंद्रित थी, न कि कानून पर। दरअसल, यह वह दौर था जब भारतीय सिविल सर्विस (आईसीएस) में प्रवेश के लिए व्यापक ज्ञान और प्रशासनिक क्षमता को प्राथमिकता दी जाती थी।


आईसीएस में करियर की शुरुआत


1926में, वांचू ने आईसीएस परीक्षा पास की और 1दिसंबर को उत्तर प्रदेश में जॉइंट मजिस्ट्रेट के रूप में अपनी सेवा शुरू की। आईसीएस ब्रिटिश शासन की रीढ़ थी, जहां अधिकारी प्रशासन, राजस्व और न्यायिक मामलों को संभालते थे। वांचू ने विभिन्न प्रशासनिक पदों पर काम किया, जिसमें मजिस्ट्रेट से लेकर उच्च स्तरीय भूमिकाएं शामिल थीं। इस अनुभव ने उन्हें कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं से परिचित कराया, भले ही उन्होंने कभी कानून की औपचारिक पढ़ाई न की हो।


बिना कानून डिग्री के जज कैसे बने?


1947में जब भारत आजादी की दहलीज पर था, तब वांचू को इलाहाबाद हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति लॉर्ड वेवेल द्वारा की गई थी और उस समय गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935के तहत हाई कोर्ट जजों की योग्यता में लचीलापन था। इस एक्ट के अनुसार, जज बनने के लिए बैरिस्टर होना जरूरी नहीं था। यानी आईसीएस अधिकारियों को उनके प्रशासनिक अनुभव के आधार पर नियुक्त किया जा सकता था, खासकर अगर उन्होंने जिला जज या सबऑर्डिनेट जज के रूप में काम किया हो। इसी वजह से वांचू जैसे आईसीएस अधिकारी, जो न्यायिक मामलों में शामिल रहे थे, को सीधे हाई कोर्ट में जगह मिल सकती थी।


भारत का संविधान 1950में लागू हुआ, लेकिन उससे पहले की नियुक्तियां जारी रहीं। संविधान के अनुच्छेद 124और 217में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट जजों के लिए योग्यताएं निर्धारित हैं। जैसे – हाई कोर्ट जज के रूप में 5साल का अनुभव, 10साल की वकालत, या प्रतिष्ठित न्यायविद होना। लेकिन वांचू की नियुक्ति पूर्व-संविधान काल की थी। इसलिए वे भारत के इतिहास में एकमात्र ऐसे मुख्य न्यायाधीश हैं जिनके पास कानून की डिग्री नहीं थी और जिन्होंने वकील के रूप में प्रैक्टिस नहीं की।


राजस्थान से सुप्रीम कोर्ट तक


1947से 1951तक इलाहाबाद हाई कोर्ट में सेवा देने के बाद, वांचू को 2जनवरी 1951को राजस्थान हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। यह पद उन्होंने 10अगस्त 1958तक संभाला, जो उस कोर्ट में सबसे लंबा कार्यकाल था। जिसके बाद 11अगस्त 1958को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने 11अप्रैल 1967तक सेवा दी। इस दौरान, उन्होंने 355फैसले लिखे और 1,286बेंचों में हिस्सा लिया।


मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यकाल


12 अप्रैल 1967 को, कोका सुब्बा राव के इस्तीफे के बाद (जो राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने गए थे), वांचू को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। उनका कार्यकाल 24 फरवरी 1968 तक चला, जब वे सेवानिवृत्त हुए। इस दौरान उन्होंने भारत के तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन को शपथ दिलाई। वे विभिन्न आयोगों में भी शामिल रहे, जैसे उत्तर प्रदेश न्यायिक सुधार समिति (1950-51), इंदौर फायरिंग जांच आयोग (1954) और विधि आयोग के सदस्य (1955)।

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Santosh Singh is owner and cheif editor of Samachar Live, an independent Hindi news and information website. He is involved in researching, preparing, editing and publishing news content across various categories. Contact him at samacharlive.in@gmail.com chaeck more https://www.samacharlive.in/author-santosh-singh
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