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दियों से बारूद तक…दिवाली में पटाखों की एंट्री कब और कैसे हुई? जानिए रोचक इतिहास


Diwali 2025: दिवाली यानी दीपों का त्यौहार, लेकिन आज इसके बिना पटाखों की कल्पना भी अधूरी लगती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिवाली में पटाखों की शुरुआत कब और कैसे हुई? दरअसल, दीप जलाकर खुशियां मनाने की परंपरा तो प्राचीन काल से है, लेकिन पटाखों की एंट्री भारत में काफी बाद में हुई। इतिहास के अनुसार, आतिशबाजी की शुरुआत चीन से हुई थी और वहां से यह भारत पहुंची। चीन में बारूद के प्रयोग की शुरुआत दूसरी शताब्दी में हो चुकी थी, जबकि भारत में आठवीं शताब्दी में इसके उपयोग के संकेत मिलते हैं।


मुगलों से मिला पटाखों को जश्न का हिस्सा बनने का मौका


भारत में पटाखों का इस्तेमाल पहले युद्धों में हुआ करता था, लेकिन त्योहारों में इनकी एंट्री मुगल काल में हुई। 15वीं शताब्दी से शादियों और उत्सवों में आतिशबाजी होने लगी। मुगल चित्रों और पेंटिंग्स में इसके प्रमाण भी हैं—जैसे 1633में दारा शिकोह की शादी के दौरान आतिशबाजी का ज़िक्र। पुर्तगाली यात्री डुआर्टे बारबोसा ने भी 1518में गुजरात में एक ब्राह्मण विवाह में आतिशबाजी देखी थी। यह दर्शाता है कि 16वीं सदी तक पटाखे आम हो चुके थे।


ब्रिटिश काल तक आते-आते आतिशबाजी हुई मुख्यधारा में


17वीं और 18वीं शताब्दी में दिवाली पर पटाखों का चलन आम हो गया था। इतिहासकार सतीश चंद्र ने बीजापुर के आदिल शाह के विवाह में आतिशबाजी पर 80,000 रुपये खर्च किए जाने का उल्लेख किया है। 19वीं सदी में कोलकाता में पहली आतिशबाजी फैक्ट्री खुली और बाद में शिवकाशी (तमिलनाडु) इस उद्योग का केंद्र बन गया। तब से लेकर अब तक दिवाली पर रोशनी के साथ धमाकों का जश्न जारी है—बस अंदाज बदल गया है।

Santosh Singhhttps://www.samacharlive.in/author-santosh-singh
Santosh Singh is owner and cheif editor of Samachar Live, an independent Hindi news and information website. He is involved in researching, preparing, editing and publishing news content across various categories. Contact him at samacharlive.in@gmail.com chaeck more https://www.samacharlive.in/author-santosh-singh
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