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भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाएगा नया युद्धपोत INS माहे, समुद्र के अंदर दुश्मनों का होगा सफाया

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INS Mahe Anti-Submarine Warfare Hunter Ship: भारतीय नौसेना ने आज एक अहम कदम उठाते हुए INS माहे को मुंबई स्थित नौसेना में शामिल हो गया है। माहे-क्लास एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW SWC) का पहला जहाज है। इस जहाज को ‘साइलेंट हंटर’ कहा जा रहा है, क्योंकि यह उथले पानी में दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाकर उन्हें तबाह करने में सक्षम है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी की मौजूदगी में नेवल डॉकयार्ड, मुंबई में आयोजित समारोह में इसकी कमीशनिंग हुई। यह जहाज आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसमें 80%से अधिक हिस्सा स्वदेशी है। 


बता दें, INS माहे का निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) द्वारा किया गया है, और इसे 23अक्टूबर 2025को नौसेना को सौंपा गया था। आज के समारोह में जनरल द्विवेदी ने इसे राष्ट्र की बढ़ती क्षमता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा ‘यह हमारे देश की डिजाइन, निर्माण और जटिल लड़ाकू जहाजों को स्वदेशी तकनीक से तैयार करने की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है।’ जहाज का नाम मालाबार तट पर स्थित ऐतिहासिक शहर माहे के नाम पर रखा गया है। यह आठ जहाजों की श्रृंखला का पहला है, और बाकी जहाज 2027तक डिलीवर किए जाएंगे।


तकनीकी विशेषताएं और क्षमताएं


INS माहे एक कॉम्पैक्ट लेकिन शक्तिशाली जहाज है, जो उथले पानी में ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है।


  1. आकार और गति:लंबाई 78मीटर, चौड़ाई 11मीटर, विस्थापन करीब 1,100टन। अधिकतम गति 25नॉट्स (करीब 46किमी/घंटा), क्रूजिंग स्पीड 14नॉट्स पर 1,800समुद्री मील की रेंज, और 14दिनों की एंड्योरेंस। क्रू में लगभग 60सदस्य होते हैं।

  2. प्रोपल्शन:ट्विन-शाफ्ट डीजल इंजन, जो 6मेगावाट से अधिक पावर जनरेट करते हैं।

  3. हथियार और सिस्टम:लाइटवेट एक्यूस्टिक-होमिंग टॉरपीडो, मल्टी-फंक्शनल ASW रॉकेट लॉन्चर, 30mm रिमोट वेपन स्टेशन (आरडब्ल्यूएस) सेल्फ-डिफेंस के लिए, और माइन-लेइंग रेल्स। स्वदेशी सिस्टम जैसे हल-माउंटेड सोनार, मल्टी-फंक्शन सर्विलांस रडार, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ESM) और EW सूट शामिल हैं।


क्षमताएं: उथले पानी (3 मीटर से कम गहराई) में ASW मिशन, तटीय गश्त, अंडरवाटर सर्विलांस, माइन-लेइंग। यह बड़े जहाजों की तुलना में अधिक चुपके से काम करता है, जिससे दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाना और नष्ट करना आसान होता है। यह पुराने अभय-क्लास कोर्वेट्स की जगह लेगा और भारतीय महासागर में डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीनों की निगरानी बढ़ाएगा।

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