Bihar SIR: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से सवाल किया। कोर्ट ने कहा कि आयोग हमें बताए कि 2003 में बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान मतदाताओं से कौन-कौन से दस्तावेज लिए गए थे। बता दें कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने राज्य में एसआईआर कराने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की।
वकील ने किया कोर्ट से सवाल
एक पक्ष की ओर से पेश हुए वकील निजाम पाशा ने अदालत से कहा कि अगर पहले हुए एसआईआर की तारीख एक जनवरी 2003 चली जाती है, तो सब कुछ चला जाता है। यह वह तारीख है जब मतदाता सूची में संशोधन के लिए गहन कवायद की गई थी। ये कहा जा रहा है कि उस समय जारी किया गया ईपीआईसी (मतदाता) कार्ड समय-समय पर किए गए संक्षिप्त अभ्यासों के दौरान जारी किए गए कार्ड से ज्यादा विश्वसनीय है। जबकि, यह दावा गलत है। उन्होंने पूछा कि यदि गहन और संशोधन के तहत नामांकन की प्रक्रिया एक ही है, तो अभ्यास के तहत जारी किए गए ईपीआईसी कार्ड को कैसे खारिज किया जा सकता है।
वकील ने ये भी कहा कि 2003 की तारीख अवैध है और यह समझदारीपूर्ण अंतर पर आधारित नहीं है। मेरे गणना फार्म की कोई रसीद नहीं दी जा रही है और न ही रसीद को प्रमाणित करने वाला कोई दस्तावेज दिया जा रहा है। इसलिए बूथ स्तर के अधिकारियों को ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं और निचले स्तर के अधिकारियों के पास इस बात पर बहुत ज्यादा विवेकाधिकार है कि फार्म लिया जाए या नहीं।
एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने कहा कि जो प्रक्रिया अपनाई गई है, वह न तो संक्षिप्त है और न ही गहन है, बल्कि यह अधिसूचना का एक निर्माण मात्र है। यह मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया है और इसे अयोग्य ठहराने की प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। यह स्वागत करने की प्रक्रिया है, न कि इसे अप्रिय प्रक्रिया में बदलने की।









