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3 साल में सबसे कम मामले, फिर अचानक क्यों बढ़ने लगी पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं

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Stubble Burning In Punjab: पंजाब में धान की फसल कटाई के बाद फसल अवशेष यानी पराली जलाने की समस्या हर साल दिल्ली-NCR की हवा को जहरीली बना देती है। हालांकि, इस बार तीन सालों में सबसे कम घटनाएं पराली जलाने की दर्ज की गईं। लेकिन बीते दस दिनों में अचानक आई तेज उछाल ने पर्यावरण विशेषज्ञों, किसानों और सरकार की नींद उड़ा दी है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार, 15सितंबर से 20अक्टूबर तक कुल 353घटनाएं दर्ज हुईं, जो 2024की इसी अवधि के 1,212मामलों से 71प्रतिशत कम हैं। फिर भी 11अक्टूबर तक केवल 116मामलों के मुकाबले दस दिनों में 237नई घटनाओं ने अलार्म बजा दिया है।


पराली जलाने के मामले 3साल में सबसे कम


बचा दें, पिछले तीन सालों में पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में भारी गिरावट दर्ज की गई है। 2023में कुल 36,663मामले दर्ज हुए थे, जो 2024में घटकर 10,909रह गए, जो लगभग 70प्रतिशत की कमी को दर्शाता है। 2025में अब तक की कुल संख्या अभी भी 415के आसपास है, जो तीन सालों का न्यूनतम स्तर दर्शाती है। पीपीसीबी की एक रिपोर्ट की मानें तो इस कमी का बड़ा श्रेय जून-जुलाई में आई भयंकर बाढ़ को जाता है, जिसने खेतों को पानी में डुबो दिया, जिससे फसल अवशेषों प्राकृतिक रूप से सड़ने लगे।विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक ‘अनियोजित हस्तक्षेप’ साबित हुआ, जिससे अक्टूबर के पहले 12दिनों में घटनाएं 73प्रतिशत घटीं, 2024के 392मामलों के मुकाबले केवल 105। हरियाणा में भी 82प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।


इस मामले में सरकार के प्रयास भी कम नहीं हैं। पंजाब सरकार ने किसानों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए, फसल अवशेष प्रबंधन मशीनरी पर सब्सिडी दी और सख्त कार्रवाई की। अब तक 115 FIR दर्ज हुईं, 59किसानों के खातों में ‘लाल एंट्री’ डाली गई और 4.6लाख रुपये का जुर्माना वसूला गया। पूर्व पीपीसीबी चेयरमैन आदर्शपाल विग का कहना है कि ये प्रयास रंग ला रहे हैं, लेकिन चुनौतियां बरकरार हैं।


कमी आने के बाद उछाल क्यों?


अच्छी शुरुआत के बावजूद, 11अक्टूबर के बाद पराली जलाने के मामले बढ़ने लगे। 19अक्टूबर तक घटनाएं 308हो गईं, जो एक हफ्ते पहले के 116से दोगुनी से ज्यादा हैं।  तर्ण तारन (125मामले) और अमृतसर (112मामले) सबसे प्रभावित जिले हैं, जहां किसान रबी फसल (गेहूं) की बुआई के लिए जल्दबाजी में पराली जला रहे हैं।  विशेषज्ञों का मानना है कि बुआई की छोटी विंडो (अक्टूबर-नवंबर) और मशीनरी की कमी ने किसानों को पुरानी आदत की ओर धकेल दिया।


यह उछाल दिल्ली-NCR के लिए खतरे की घंटी है। सीपीसीबी के आंकड़े बताते हैं कि पराली जलाने से निकलने वाला धुआं दिल्ली के पीएम2.5 स्तर को 15 प्रतिशत तक प्रभावित करता है। इस साल बाढ़ के कारण शुरुआती कमी से दिल्ली का औसत पीएम2.5 51.48 माइक्रोग्राम/घन मीटर रहा (2024 के 60.79 के मुकाबले), लेकिन अब उछाल से स्थिति बिगड़ सकती है।

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