Wednesday, May 20, 2026
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सीएम नायब सैनी का किसानों को संदेश, कहा- फल उत्पादन और क्लस्टर मॉडल से बढ़ेगी आमदनी

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HARYANA NEWS: हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने चंडीगढ़ में सिविल सचिवालय में कृषि एवं बागवानी विभाग के अधिकारियों की समीक्षा बैठक में किसानों की आय बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण, बागवानी और उच्च मूल्य वाली फल फसलों के विस्तार पर विशेष जोर दिया।


मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने चंडीगढ़ में सिविल सचिवालय में कृषि एवं बागवानी विभाग के अधिकारियों की समीक्षा बैठक ली। उन्होंने निर्देश दिए कि प्रदेश में मिट्टी और जलवायु के अनुसार क्लस्टर आधारित खेती मॉडल विकसित किया जाए, ताकि किसानों को कम समय में अधिक उत्पादन और बेहतर मूल्य मिल सके। मुख्यमंत्री ने कहा कि पारंपरिक फसलों के साथ-साथ फल उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जाए। उन्होंने विशेष रूप से स्ट्रॉबेरी, नींबू, अमरूद और ड्रैगन फ्रूट जैसी प्रमुख फल फसलों के लिए उपयुक्त क्षेत्रों की पहचान कर क्लस्टर विकसित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इन फलों की बाजार में मांग और लाभकारी मूल्य को देखते हुए किसानों को इनके उत्पादन, पौध उपलब्धता, प्रसंस्करण और विपणन से जोड़ा जाए, ताकि उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सके।


मुख्यमंत्री ने अरहर, सोयाबीन, मूंगफली, दलहन, फल फसलों तथा गन्ने के ऊतक संवर्धन आधारित उत्पादन को बढ़ावा देने के निर्देश देते हुए कहा कि हर जिले की कृषि और बागवानी क्षमता का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य किसानों को बहु-फसली, बहु-उत्पाद और उच्च मूल्य आधारित खेती से जोड़कर स्थायी आय के अवसर प्रदान करना है।बैठक में मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि नरमा, सरसों, अरहर, सोयाबीन, मूंगफली और दलहनी फसलों की नई संकर एवं अधिक उत्पादन देने वाली किस्में विकसित की जाएं। साथ ही ऐसे बीजों और पौधों के अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाए जो ओलावृष्टि, जलवायु परिवर्तन और प्रतिकूल मौसम के प्रभाव को सहन कर सकें।उन्होंने कहा कि कृषि विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और पंचायत स्तर पर उपलब्ध भूमि को अनुसंधान एवं परीक्षण के लिए चिन्हित किया जाए, ताकि नई किस्मों और तकनीकों का स्थानीय परिस्थितियों में परीक्षण कर किसानों तक तेजी से पहुंचाया जा सके। विद्यार्थियों और शोध संस्थानों को भी इस अभियान से जोड़कर नवाचार को गति देने के निर्देश दिए गए।


मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि अन्य राज्यों के विश्वविद्यालयों में विकसित सफल संकर किस्मों, फल पौधों और आधुनिक तकनीकों का अध्ययन कर उन्हें हरियाणा की परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया जाए, ताकि प्रदेश के किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाली पौध और बीज उपलब्ध हो सकें।वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने 1,40,000 एकड़ सेम एवं लवणीय भूमि के सुधार का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस अभियान को और प्रभावी बनाने के लिए मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि जैव निकास के तहत सफेदा (यूकेलिप्टस) के पेड़ किसानों के खेतों की मेड़ों, नहरों के किनारों तथा नालों की मेड़ों पर बड़े पैमाने पर लगाए जाएं, ताकि जलभराव वाले क्षेत्रों से अतिरिक्त पानी को प्राकृतिक रूप से कम किया जा सके। सफेदा के पेड़ अपनी गहरी जड़ों और अधिक जल अवशोषण क्षमता के कारण सेम प्रभावित भूमि के सुधार में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होते हैं।


मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए क्लस्टर चिन्हित किए जाएं। इन क्लस्टरों में किसानों को जीवामृत, जैविक घोल, ड्रम और अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं तथा उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाए।उन्होंने कहा कि गुरुकुल कुरुक्षेत्र में आचार्य देवव्रत द्वारा अपनाई जा रही प्राकृतिक खेती पद्धति को आधार बनाकर इसे लागू किया जाए, ताकि अधिक से अधिक किसान कम लागत और टिकाऊ खेती से जुड़ सकें।मुख्यमंत्री ने यह भी निर्देश दिए कि जिन क्लस्टरों में किसान प्राकृतिक खेती को अपनाते हैं और उसमें उत्पादकता कम होती है, तो ऐसे क्लस्टर वाले किसानों के नुकसान की भरपाई सरकार द्वारा की जाए। किसानों को आर्थिक सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन देकर उनका विश्वास मजबूत किया जाए, ताकि प्राकृतिक खेती को अभियान रूप में आगे बढ़ाकर इसे जनआंदोलन बनाया जा सके।


सीएम ने निर्देश दिए कि प्रयोगशालाओं में फसलों, फल-सब्जियों एवं अन्य कृषि उत्पादों में कीटनाशक दवाइयों और कीटनाशक अवशेषों की नियमित जांच सुनिश्चित की जाए।जिन रसायनों का अत्यधिक उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और जिनसे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की आशंका बढ़ती है, उनके उपयोग पर तत्काल रोक लगाई जाए। नमूनों की जांच के लिए नमूने नियमित रूप से प्रयोगशाला भेजे जाएं तथा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए।उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि एक अत्याधुनिक जैविक प्रयोगशाला स्थापित की जाए, जिसमें जैविक उत्पादों और जैविक उत्पादन से संबंधित सभी नमूनों की नियमित जांच की जा सके। इस प्रयोगशाला में मिट्टी, पानी, जैविक खाद, फसल और अन्य आवश्यक घटकों के नमूनों का वैज्ञानिक परीक्षण सुनिश्चित किया जाए, ताकि जैविक खेती की गुणवत्ता, शुद्धता और मानकों की प्रभावी निगरानी हो सके।

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