Wednesday, May 27, 2026
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बिहार में आसमानी बिजली का कहर, पिछले 48 घंटे के भीतर 61 लोगों की मौत

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Bihar Alarming Rise In Lightning Deaths: बिहार के कई जिलों में बीते दो दिनों में आकाश से गिरी बिजली ने भारी तबाही मचाई है। इस हादसे में अब तक कम से कम 61 लोगों की जान चली गई है। सबसे ज्यादा 22 मौतें नालंदा जिले में हुई हैं। यह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जिला है।


बता दें कि, अन्य जिलों में पटना, भोजपुर, सिवान और गया में चार-चार लोगों की मौत हुई है। गोपालगंज और जमुई में तीन-तीन, जबकि मुजफ्फरपुर, जहानाबाद, सारण और अरवल में दो-दो लोगों की जान गई है। इसके अलावा बेगूसराय, दरभंगा, सहरसा, कटिहार, मुंगेर, मधेपुरा, अररिया और भागलपुर में एक-एक व्यक्ति की मौत हुई है।राज्य सरकार ने कहा है कि जिन परिवारों ने अपने सदस्य को खोया है, उन्हें 4 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी।


हर साल बढ़ रही हैं बिजली गिरने से मौतें


बिहार में हर साल आकाशीय बिजली से मरने वालों की संख्या बढ़ रही है।


– 2020 में 83 लोगों की मौत हुई।


– 2021 में 280 लोगों की जान गई।


– 2022 में 329 लोगों की मौत हुई।


– 2023 में 275 लोग मारे गए।


इस साल अभी अप्रैल भी पूरा नहीं हुआ है, और अब तक 82 लोगों की जान जा चुकी है।


देशभर में भी चिंता की बात


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और दूसरी रिपोर्टों के मुताबिक, 1967 से 2020 तक देश में एक लाख से ज्यादा लोग आकाशीय बिजली की चपेट में आकर मारे गए हैं। यानी हर साल औसतन 1,876 लोगों की मौत होती है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और ओडिशा सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य हैं। लेकिन क्षेत्रफल के हिसाब से बिहार सबसे ज्यादा खतरे में रहता है। यहां हर साल औसतन 79 लोगों की जान जाती है।


बिजली गिरने की मुख्य वजहें


विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे कई कारण हैं। जैसे:


– मौसम में बदलाव


– ग्लोबल वॉर्मिंग


– पेड़ों की कटाई


– पानी के स्रोतों की कमी


इंसानों की बढ़ती गतिविधियां


गांवों में किसान और मजदूर अक्सर खुले में काम करते हैं। इसी दौरान वे बिजली गिरने की चपेट में आ जाते हैं। समय पर चेतावनी न मिलना, जानकारी की कमी और सरकार की कमजोर तैयारी भी इन मौतों की बड़ी वजहें हैं।


ठोस योजना का अब भी इंतजार


भारत ने बाढ़, तूफान और चक्रवात जैसी आपदाओं से निपटने के लिए कई तैयारियां की हैं। लेकिन आकाशीय बिजली और लू जैसी घटनाओं पर अब भी ध्यान नहीं दिया गया है। देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ 7 के पास ही इस विषय पर कोई ठोस योजना है। बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे राज्यों में अब तक ऐसी कोई नीति नहीं बनी है, जबकि इन्हें सबसे ज्यादा खतरा रहता है।

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