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PDA फॉर्मूले में अड़चन बने आज़म खान! मुलाक़ात से पहले की शर्तों ने बढ़ाईं अखिलेश की राह में मुश्किलें

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Akhilesh & Azam Meeting: उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की राजनीति का नया फॉर्मूला PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) 2027 की रणनीति की नींव माना जा रहा है, लेकिन इस फॉर्मूले का ‘A’ यानी अल्पसंख्यक वोट बैंक अभी से असहज होता नजर आ रहा है। समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आज़म खान की नाराज़गी अब खुलकर सामने आ चुकी है। अखिलेश यादव की रामपुर यात्रा को लेकर जो सियासी सरगर्मी दिख रही है, वो सपा के भीतर सब कुछ ठीक न होने का संकेत दे रही है। मुलायम सिंह यादव के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने वाले आज़म खान से अखिलेश की ये मुलाक़ात केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राजनीतिक लिहाज से भी बेहद अहम मानी जा रही है।


मुलाक़ात से पहले शर्तों का एलान


रामपुर में आज़म खान से मुलाक़ात के लिए अखिलेश यादव की यात्रा का रूट और तारीख मायावती की लखनऊ रैली से ठीक पहले तय की गई, जिससे यह पूरी कवायद राजनीतिक लाभ से जुड़ी दिखी। लेकिन आज़म खान ने साफ शर्तों के साथ अखिलेश से मिलने की इजाजत दी — न कोई तीसरा व्यक्ति हो, न परिवार का कोई सदस्य मिले और न ही रामपुर के मौजूदा सांसद मोहिबुल्ला नदवी। उनका कहना है, “वो आएं, ये मेरे लिए सम्मान की बात है… लेकिन मैं अब सिर्फ उन्हें ही देखना चाहता हूं, जिन्होंने मुश्किल वक्त में साथ नहीं दिया, उन्हें नहीं।”


सियासी समीकरणों में उलझा अल्पसंख्यक फैक्टर


समाजवादी पार्टी में मुस्लिम वोटों की बड़ी हिस्सेदारी रही है, लेकिन आज़म खान जैसे बड़े चेहरे की उपेक्षा और उनकी नाराजगी सपा के लिए खतरे की घंटी है। 2024के लोकसभा चुनावों में मिली आंशिक सफलता ने PDA फॉर्मूले को हवा दी थी, लेकिन अब पार्टी के भीतर से ही दरारें उभर रही हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जातीय जनगणना पर रोक और योगी सरकार की सख्ती के बीच, मुस्लिम वोटों को साधना अखिलेश के लिए आसान नहीं रहेगा। आज़म की नाराज़गी साफ तौर पर ‘A’ को कमजोर कर रही है।


राजनीतिक विकल्प सीमित, लेकिन असर बड़ा


आज़म खान का विकल्प सीमित है। बीजेपी या कांग्रेस में उनके जाने की संभावना ना के बराबर है। बसपा भले ही एक राजनीतिक शरण बन सकती हो, लेकिन उम्र, बीमारी और कानूनी झंझटों से जूझ रहे आज़म के लिए यह राह भी आसान नहीं। यही वजह है कि उनकी सियासी प्रासंगिकता समाजवादी पार्टी के भीतर ही बनी रह सकती है। हालांकि, अगर अखिलेश उनसे दूरी बनाए रखते हैं या शर्तों पर मिलने से इनकार करते हैं, तो 2027के चुनावी समीकरण में मुस्लिम फैक्टर की गैरहाज़िरी सपा की रणनीति को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।


आजम खान और अखिलेश यादव की मुलाकात सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के भविष्य की दिशा तय करने वाला मोड़ बन सकती है। PDA फॉर्मूले में ‘A’ की नाराजगी, अगर सही समय पर नहीं सुलझाई गई, तो सत्ता की सीढ़ी चढ़ने से पहले ही अखिलेश की योजना लड़खड़ा सकती है।

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