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जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर कपिल सिब्बल की दलीलें, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई जोरदार फटकार

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Justice Yashwant Verma’s Petition: 30जुलाई बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुनवाई हुई। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच समिति की उस रिपोर्ट को चुनौती देती है, जिसमें जस्टिस वर्मा को उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर आग लगने की घटना के बाद बरामद हुई जली हुई नकदी के मामले में कदाचार का दोषी ठहराया गया था। जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस मामले में जोरदार दलीलें पेश कीं, जिसमें संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायिक स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल उठाए गए।


क्या है पूरा मामला?


दरअसल, 14मार्च को जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास के एक स्टोररूम में आग लगी थी। आग बुझाने के दौरान दिल्ली फायर सर्विस कर्मियों को जली हुई नकदी की गड्डियां मिलीं। जिसके बाद यह मामला विवादों में आ गया। एक वीडियो जिसमें जलती हुई नकदी दिखाई गई थी, वायरल हो गया। जिसके बाद भ्रष्टाचार के आरोप लगे। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने इस मामले की जांच के लिए तीन जजों की एक इन-हाउस समिति गठित की।


जिसमें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जज अनु सिवरमन शामिल थीं। इस समिति ने 03मई को अपनी रिपोर्ट सौंपी। जिसमें जस्टिस वर्मा के खिलाफ ‘मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्य’ होने की बात कही गई और उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की गई। इसके बाद, तत्कालीन CJI ने 08मई को यह रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी, जिसके आधार पर संसद में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू हुई।


कपिल सिब्बल की प्रमुख दलीलें


सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कई दलीलें पेश कीं। सिब्बल ने तर्क दिया कि किसी जज को हटाने की प्रक्रिया केवल संविधान के अनुच्छेद 124और 218के तहत संसद द्वारा और जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968के प्रावधानों के अनुसार ही हो सकती है। इन-हाउस जांच प्रक्रिया, जो 1999में सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुरू की गई थी, एक ‘समानांतर और असंवैधानिक तंत्र’ है, जो संसद के विशेषाधिकारों का अतिक्रमण करती है। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया विधायी स्वीकृति के बिना है और इसलिए अवैध है।


सिब्बल ने आरोप लगाया कि इन-हाउस समिति ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया। जस्टिस वर्मा को जांच प्रक्रिया की जानकारी नहीं दी गई। उन्हें साक्ष्य जुटाने में भाग लेने का अवसर नहीं मिला, गवाहों की पूछताछ उनकी अनुपस्थिति में की गई और CCTV फुटेज जैसे महत्वपूर्ण साक्ष्य एकत्र नहीं किए गए। उन्होंने आगे कहा कि नकदी बरामदगी के संबंध में कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई थी, न ही नकदी को जब्त किया गया और न ही पंचनामा तैयार किया गया। जांच केवल कुछ अधिकारियों द्वारा निजी तौर पर लिए गए फोटो और वीडियो पर आधारित थी, जो विश्वसनीय नहीं हैं। 


कपिल सिब्बल ने जोर देकर कहा कि इन-हाउस जांच प्रक्रिया न केवल संसद की शक्तियों को कम करती है, बल्कि यह न्यायिक स्वतंत्रता को भी खतरे में डालती है, जो संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। उन्होंने तर्क दिया कि तत्कालीन CJI द्वारा की गई बर्खास्तगी की सिफारिश महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन करती है। उन्होंने कहा कि जब तक सिद्ध कदाचार साबित नहीं हो जाता, तब तक किसी जज के आचरण पर संसद में भी चर्चा नहीं हो सकती। फिर भी एक वीडियो के आधार पर जिसे 22 मार्च को सार्वजनिक किया गया, जस्टिस वर्मा को पहले ही ‘दोषी’ मान लिया गया, जिसने उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया।

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